अतः भगवान को भोग लगाने के बाद आश्रित जीव-जंतुओं का भाग निकालना चाहिए। इस क्रिया को हम सभी के पूर्वज (दादी, नानी आदि) करते चले आए हैं।
दान किसी पर अहसान करके नहीं करना चाहिए क्योंकि यह तो हमारी स्वेच्छा तथा श्रद्धा पर निर्भर होता है तथा दान देते समय अपने दुखों, कष्टों, दारिद्र्य आदि को कम किया जाना ही
जातक का उद्देश्य होता है।
अनिष्ट ग्रहों की शांति तथा विभिन्न प्रकार के कष्ट निवारण के लिए भी दान क
िया जाता है।
अपनी आय का कुछ भाग दान करने से आत्म शुद्धि तथा धन की वृद्धि अवश्य ही होती है।
यह परम सत्य है कि दान अपने स्वयं के कल्याण के लिए ही किया जाता है
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दान से दरिद्रता दूर होती है, यहाँ तक कि अगला जन्म तक सुधर जाता है।
दान देने से कभी भी कमी नहीं आती है क्योंकि किसी भी प्रकार से किया गया दान कभी भी खाली नहीं जाता है अपितु अगले जन्म तक उसका फल-प्रतिफल प्राप्त होता है।
दान पुण्य कर्मों के एकत्रीकरण का उपाय भी है तथा अपने द्वारा किए गए अशुभ कर्मों का पाश्चाताप भी है।
अशुभ कर्मों के निवारण के अनेकों सहज व सटीक उपाय हैं परन्तु उन सभी में सबसे महत्वपूर्ण उपाय दान है
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एक हाथ से दान किया जाये तो दूसरे हाथ को पता भी न चले।